पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
ब्रह्मविद्या का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (पितरः) पालनेवाले [सूर्य आदि लोक] (ताम्) उस (स्वधाम्) आत्मधारण शक्ति [विराट्] का (उप जीवन्ति) आश्रय लेकर जीते, हैं (उपजीवनीयः) वह [दूसरों का] आश्रय (भवति) होता है, (यः एवम् वेद) जो ऐसा जानता है ॥८॥
भावार्थभाषाः - ब्रह्मज्ञानी पुरुष सूर्य आदि लोकों में ईश्वरशक्ति देखकर उस के आश्रित रह कर सबकी उन्नति करते हैं ॥८॥
टिप्पणी: ८−(स्वधाम्) आत्मधारणशक्तिम् (पितरः) पालकाः सूर्यादिलोकाः। अन्यत् पूर्ववत् ॥
