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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
ब्रह्मविद्या का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (यमः) नियमवान् (राजा) राजा [यह प्राणी] (तस्याः) उस [विराट्] का (वत्सः) उपदेष्टा, और (रजतपात्रम्) प्रीति वा ज्ञान वा पूजा का आधार [ब्रह्म] (पात्रम्) रक्षासाधन (आसीत्) था ॥६॥
भावार्थभाषाः - न्यायी धार्मिक पुरुष सूर्य आदि लोकों में ईश्वरशक्ति देखकर परब्रह्म में अनुराग करते हैं ॥६॥
टिप्पणी: ६−(यमः) नियमवान् प्राणी (राजा) ऐश्वर्यवान् (वत्सः) वद व्यक्तायां वाचि-स। उपदेष्टा (रजतपात्रम्) पृषिरञ्जिभ्यां कित्। उ० ३।१११। रञ्ज रागे-अतच्। अथवा रजति गतिकर्मा-निघ० २।१४। रजयति रञ्जयति अर्चतिकर्मा-निघ० ३।१४। पूर्ववत्-अतच्। प्रीतिपात्रम्। ज्ञानाधारः। पूजाधारः परमेश्वरः। अन्यत् पूर्ववत् ॥
