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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
ब्रह्मविद्या का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (सा उत् अक्रामत्) वह [विराट्] ऊपर चढ़ी, (सा) वह (पितॄन्) पालन करनेवाले [सूर्य आदि लोकों] में (आ अगच्छत्) आयी, (ताम्) उसको (पितरः) पालनेवाले [लोकों] ने (उप अह्वयन्त) पास बुलाया,(स्वधे) हे आत्मधारण शक्ति ! (आ इहि) तू आ, (इति) बस ॥५॥
भावार्थभाषाः - सब सूर्य आदि लोक ईश्वरशक्ति के धारण-आकर्षण द्वारा पुष्ट होकर स्थित हैं ॥५॥
टिप्पणी: ५−(पितॄन्) पालकान् सूर्यादिलोकान् (पितरः) पालका लोकाः (स्वधे) अ० २।२९।७। हे आत्मधारणशक्ते। अन्यत् पूर्ववत् ॥
