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तां द्विमू॑र्धा॒र्त्व्योधो॒क्तां मा॒यामे॒वाधो॑क्।

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

ताम् । द्विऽमूर्धा । अर्त्व्य: । अधोक् । ताम् । मायाम् । एव । अधोक् ॥१३.३॥

अथर्ववेद » काण्ड:8» सूक्त:10» पर्यायः:4» मन्त्र:3


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

ब्रह्मविद्या का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (ताम्) उस [विराट्] को (अर्त्व्यः) गति में चतुर (द्विमूर्धा) दो बन्धनवाले [संचित और क्रियमाण कर्मवाले जीव] ने (अधोक्) दुहा है, (ताम्) उस (मायाम्) माया [बुद्धि] को (एव) ही (अधोक्) दुहा है ॥३॥
भावार्थभाषाः - संचित अर्थात् पूर्वजन्म के फल और आचार्य आदि से संगृहीत शिक्षारूप फल और दूसरे क्रियमाण कर्म जो पूर्व संस्कार के अनुसार किये जाते हैं, इन दोनों प्रकार के कर्मों द्वारा मनुष्य परमेश्वर की शक्ति के अभ्यास से आनन्द पाता है ॥३॥
टिप्पणी: ३−(ताम्) विराजम् (द्विमूर्धा) श्वन्नुक्षन्पूषन्प्लीहन्क्लेदन्स्नेहन्मूर्धन्०। उ० १।१५९। मुर्वी बन्धने-कनिन्, उकारस्य दीर्घः, वकारस्य धः। संचितक्रियमाणकर्मभ्यां द्विबन्धनो जीवः (अर्त्व्यः) भृमृशीङ्०। उ० १।७। ऋत गतौ जुगुप्सायां कृपायां च-उ प्रत्ययः। तत्र साधुः। पा० ४।४।९८। अर्त्तु-यत्। ऋत्व्यवास्त्व्य०। पा० ६।४।१७५। उकारस्य यण् निपानात्। गतौ साधुः (अधोक्) दुह प्रपूरणे-लङ्। दुग्धवान् (ताम्) (मायाम्) बुद्धिम्। विराजम् (एव) ॥