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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
ब्रह्मविद्या का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (सप्तऋषयः) सात ऋषि [त्वचा आदि-म० ४] (तत्) उस (ब्रह्म) वेद (च च) और (तपः) तप [ब्रह्मचर्य आदि व्रत वा ऐश्वर्य] का (उप जीवन्ति) सहारा लेकर जीते हैं, (ब्रह्मवर्चसी) वेदविद्या से प्रकाशवाला (उपजीवनीयः) [दूसरों का] आश्रय (भवति) होता है, (यः एवम् वेद) जो ऐसा जानता है ॥१६॥
भावार्थभाषाः - जितेन्द्रिय पुरुष वेदविद्या और तपश्चरण से तेजस्वी होकर आनन्द भोगते हैं ॥१६॥
टिप्पणी: १६−(ब्रह्मवर्चसी) ब्रह्महस्तिभ्यां वर्चसः। पा० ५।४।७८। अच् समासान्तः, तत इति। वेदविद्याप्रदीप्तः। अन्यत् पूर्ववत् ॥
