0 बार पढ़ा गया
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
ब्रह्मविद्या का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (आङ्गिरसः) महाज्ञानी परमेश्वर के जाननेवाले (बृहस्पतिः) बड़े-बड़े गुणों के रक्षक पुरुष ने (ताम्) उस [विराट्] को (अधोक्) दुहा है, (ताम्) उसी से (ब्रह्म) वेद (च च) और (तपः) तप [ब्रह्मचर्य आदि व्रत वा ऐश्वर्य] को (अधोक्) दुहा है ॥१५॥
भावार्थभाषाः - ब्रह्मज्ञानी पुरुष ईश्वरशक्ति से वेद और सामर्थ्य प्राप्त करते हैं ॥१५॥
टिप्पणी: १५−(बृहस्पतिः) अ० १।८।२। बृहतां गुणानां रक्षकः (आङ्गिरसः) अ० ५।१९।२। तदधीते तद्वेद। पा० ४।२।५९। अङ्गिरस्-अण्। आङ्गिरसः सर्वज्ञस्य परमेश्वरस्य वेत्ता (ब्रह्म) वेदम् (तपः) ब्रह्मचर्यादिव्रतम्। ऐश्वर्यम्। अन्यत् पूर्ववत् ॥
