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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
ब्रह्मविद्या का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (राजा) राजा (सोमः) सुख उत्पन्न करने हारा [जीवात्मा] (तस्याः) उस [विराट्] का (वत्सः) उपदेष्टा और (छन्दः) स्वतन्त्रता [रूप ब्रह्म] (पात्रम्) रक्षासाधन (आसीत्) था ॥१४॥
भावार्थभाषाः - यह जीवात्मा परमेश्वर की स्वतन्त्रता में अनन्त शक्ति साक्षात् करके आनन्द पाता है ॥१४॥
टिप्पणी: १४−(सोमः) सोमः सूर्यः प्रसवनात्, सोम आत्माप्येतस्मादेव-निरु० १४।१२। सुखोत्पादको जीवात्मा (राजा) ऐश्वर्यवान् (छन्दः) स्वातन्त्र्यम्। अन्यत् पूर्ववत् ॥
