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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
ब्रह्मविद्या का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (सा उत् अक्रामत्) वह [विराट्] ऊपर चढ़ी, (सा) वह (सप्तऋषीन्) सात ऋषियों में [व्यापनशील वा दर्शनशील अर्थात् त्वचा, नेत्र, कान, जिह्वा, नाक, मन और बुद्धि में-अ० ४।११।९] (आ अगच्छत्) आयी, (ताम्) उस को (सप्तऋषयः) सात ऋषियों [त्वचा आदि] ने (उप अह्वयन्त) पास बुलाया,(ब्रह्मण्वति) हे वेदवती ! (आ इहि) तू आ, (इति) बस ॥१३॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य इन्द्रियों द्वारा ईश्वरशक्ति का अनुभव करके ब्रह्मविद्या प्राप्त करते हैं ॥१३॥
टिप्पणी: १३−(सप्तऋषीन्) अ० ४।११।९। सप्त ऋषयः षडिन्द्रियाणि विद्या सप्तमी-निरु० १२।३७। त्वक्चक्षुःश्रवणरसनाघ्राणमनोबुद्धीः (सप्तऋषयः) पूर्वोक्ताः त्वक्चक्षुरादयः (ब्रह्मण्वति) अ० ६।१०८।२। हे वेदवति। अन्यत् पूर्ववत् ॥
