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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
ब्रह्मविद्या का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (मनुष्याः) मनुष्य (ते) उन दोनों (कृषिम्) खेती (च च) और (सस्यम्) धान्य का (उप जीवन्ति) सहारा लेकर जीते हैं, (कृष्टराधिः) वह खेती में सिद्धिवाला (उपजीवनीयः) [दूसरों का] आश्रय (भवति) होता है (यः एवम् वेद) जो ऐसा जानता है ॥१२॥
भावार्थभाषाः - पुरुषार्थी ज्ञानी पुरुष उत्तम कर्म से उत्तम फल पाकर किसानों के समान उपकारी होते हैं ॥१२॥
टिप्पणी: १२−(कृष्टराधिः) कृष विलेखने-क्त। सर्वधातुभ्य-इन्। उ० ४।११८। राध संसिद्धौ-इन्। भूमिकर्षणसाधकः। अन्यत् पूर्ववत् ॥
