पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
ब्रह्मविद्या का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (तस्मात्) इसीलिये (मनुष्येभ्यः) मनुष्यों को (उभयद्युः) दोनों दिन [प्रति दिन] वे [ईश्वरनियम] (उप हरन्ति) उपहार देते हैं, (अस्य) उसके (गृहे) घर में वे [ईश्वरनियम] (उप हरन्ति) उपहार देते हैं, (यः एवम् वेद) जो ऐसा जानता है ॥८॥
भावार्थभाषाः - ईश्वर का विचार करनेवाले पुरुष सब कुटुम्बियों सहित उत्तम पदार्थों से आनन्द भोगते हैं ॥८॥
टिप्पणी: ८−(उभयद्युः) अ० ७।११६।२। उभयदिनयोः। प्रतिदिनमित्यर्थः। (उप हरन्ति) उपहारेण ददति श्रेष्ठपदार्थान् (गृहे) गेहे। अन्यत् पूर्ववत् ॥
