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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
ब्रह्मविद्या का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (सा उत् अक्रामत्) वह [विराट्] ऊपर चढ़ी, (सा) वह (मनुष्यान्) मननशील मनुष्यों में (आ अगच्छत्) आयी, (ताम्) उसको (मनुष्याः) मनुष्य (अघ्नत) प्राप्त हुए, (सा) वह (सद्यः) तुरन्त ही (सम् अभवत्) [उनमें] संयुक्त हुयी ॥७॥
भावार्थभाषाः - मननशील पुरुष ईश्वरशक्ति का अनुभव तुरन्त कर लेते हैं ॥७॥
टिप्पणी: ७−(मनुष्यान्) मननशीलान् मनुष्यान् (सद्यः) अ० २।१।४। तत्क्षणम्। अन्यत् सुगमम् ॥
