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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
ब्रह्मविद्या का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (सा उत् अक्रामत्) वह [विराट्] ऊपर चढ़ी, (सा) वह (देवान्) सूर्य की किरणों में (आ अगच्छत्) आयी, (ताम्) उसको (देवाः) किरणें (अघ्नत) प्राप्त हुए, (सा) वह (अर्धमासे) आधे महीने [पखवाड़े] में (सम् अभवत्) संयुक्त हुयी ॥५॥
भावार्थभाषाः - ईश्वरशक्ति किरणों द्वारा अर्ध मास आदि समय उत्पन्न करती है ॥५॥
टिप्पणी: ५−(देवान्) देवो दानाद्वा दीपनाद् वा द्योतनाद्वा द्युस्थानो भवतीति वा-निरु० ७।१५। देवाः रश्मयः, इति दुर्गाचार्यनिरुक्तटीकायाम्-१२।३९। आदित्यरश्मीन् (अर्धमासे) मासपक्षकाले। अन्यत् पूर्ववत् ॥
