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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
ब्रह्मविद्या का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (तस्मात्) इसी कारण (पितृभ्यः) ऋतुओं को [वा ऋतुओं से] (मासि) महीने-महीने (उपमास्यम्) चन्द्रमा में रहनेवाले अमृत को वे [ईश्वरनियम] (ददति) देते हैं, वह (पितृयाणम्) ऋतुओं के चलने योग्य (पन्थाम्) मार्ग को (प्र जानाति) जान लेता है (यः एवम् वेद) जो ऐसा जानता है ॥४॥
भावार्थभाषाः - ऋतुओं के गुणों को जानकर मनुष्य ऋतुओं की सूक्ष्म अवस्था जान लेता है ॥४॥
टिप्पणी: ४−(पितृभ्यः) ऋतूनामर्थम्। ऋतूनां सकाशात् (मासि) मासे (उपमास्यम्) मासि चन्द्रमसि प्रभवममृतम् (ददति) प्रयच्छन्ति, ईश्वरनियमा इति शेषः (प्र) प्रकर्षेण (पितृयाणम्) ऋतुभिर्गमनीयम् (पन्थाम्) मार्गम्। अन्यत् सुगमम् ॥
