पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
ब्रह्मविद्या का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (सा उत् अक्रामत्) वह [विराट्] ऊपर चढ़ा, (सा) वह (पितॄन्) ऋतुओं में (आ अगच्छत्) आई, (ताम्) उसको (पितरः) ऋतुएँ (अघ्नत) प्राप्त हुए, (सा) वह (मासि) महीने में [वा चन्द्रमा में] (सम् अभवत्) संयुक्त हुई ॥३॥
भावार्थभाषाः - ईश्वरशक्ति की महिमा ऋतु आदि कालों में प्रकट है ॥३॥
टिप्पणी: ३−(पितॄन्) ऋतून्-दयानन्दभाष्ये, यजु० ८।६०। (पितरः) ऋतवः (मासि) मासे मासे। चन्द्रमसि। अन्यत् पूर्ववत् ॥
