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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
ब्रह्मविद्या का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (तस्मात्) इसीलिये (संवत्सरे) वर्ष भर में (वनस्पतीनाम्) वनस्पतियों का (वृक्णम्) खण्डित अंश (अपि रोहति) भर जाता है, (अस्य) उसका (अप्रियः) अप्रिय (भ्रातृव्यः) भ्रातृ भाव से रहित [शत्रु, मनोदोष] (वृश्चते) कट जाता है, (यः एवम् वेद) जो ऐसा जानता है ॥२॥
भावार्थभाषाः - ब्रह्मज्ञानी पुरुष अन्न आदि पदार्थों की न्यूनता की पूर्णता वर्ष भर में वृष्टि द्वारा देखकर आत्मिक दोषों के त्याग से ज्ञान की पूर्त्ति द्वारा ईश्वरशक्ति का अनुभव करते हैं ॥२॥
टिप्पणी: २−(तस्मात्) कारणात् (वृक्णम्) ओव्रश्चू छेदने-क्त। खण्डितभागः (अपि रोहति) प्रपूर्य्यते (वृश्चते) वृश्च्यते। छिद्यते (अस्य) ब्रह्मवादिनः। (अप्रियः) अहितः (भ्रातृव्ये) व्यन्त्सपत्ने पा० ४।१।१४५। भ्रातृ-व्यन्। भ्रातृभावरहितः। शत्रुः। मनोदोषः। अन्यत् पूर्ववत् ॥
