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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
ब्रह्मविद्या का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (सा उत् अक्रामत्) वह [विराट्] ऊपर चढ़ी, (सा) वह (वनस्पतीन्) वनस्पतियों [वृक्ष आदि पदार्थों] में (आ अगच्छत्) आयी, (ताम्) उसको (वनस्पतयः) वनस्पतियाँ (अघ्नत) प्राप्त हुईं, (सा) वह (संवत्सरे) संवत्सर [वर्ष काल] में (सम् अभवत्) संयुक्त हुई ॥१॥
भावार्थभाषाः - विराट्, ईश्वरशक्ति का प्रादुर्भाव वृक्ष आदि पदार्थों में हैं ॥१॥
टिप्पणी: १−(वनस्पतीन्) वृक्षादिपदार्थान् (आ अगच्छत्) आगतवती (ताम्) विराजम् (वनस्पतयः) (अघ्नत) हन हिंसागत्योः। अघ्नन्। अगच्छन् (सा) (संवत्सरे) संवसन्ति ऋतवोऽत्र, सम्+वस-सरन्। द्वादशमासात्मके काले (सम् अभवत्) समगच्छत्। अन्यद्गतम् ॥
