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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
ब्रह्मविद्या का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (देवाः) गतिमान् लोकों ने (एव) अवश्य (ओषधीः) अन्न आदि ओषधियों को (रथन्तरेण) रथन्तर [रमणीय पदार्थों से पार लगानेवाले जगत्] द्वारा, (व्यचः) विस्तार को (बृहता) बृहत् [बड़े आकाश] द्वारा, (अपः) प्रजाओं को (वामदेव्येन) वामदेव [मनोहर परमात्मा] से जताये गये [भूतपञ्चक] द्वारा और (यज्ञम्) यज्ञ [संयोग-वियोग आदि] की (यज्ञायज्ञियेन) सब यज्ञों के हितकारी [वेदज्ञान] द्वारा (अदुह्रन्) दुहा है ॥७, ८॥
भावार्थभाषाः - उसी विराट् ईश्वरशक्ति से सब लोक-लोकान्तरों का जीवन और स्थिति है ॥७, ८॥
टिप्पणी: ७, ८−(ओषधीः) अन्नादिपदार्थान् (एव) अवश्यम् (रथन्तरेण) म० ६। जगद्द्वारा (देवाः) गतिशीला लोकाः (अदुह्रन्) अदुहन्। प्रपूरितवन्तः (व्यचः) निरु० ८।१०। विस्तारम् (बृहता) म० ६। प्रवृद्धेनाकाशेन (अपः) प्रजाः−दयानन्दभाष्ये, यजु० ६।२७। उत्पन्नान् पदार्थान् (वामदेव्येन) म० ६। मनोहरेण परमात्मना विज्ञापितेन भूतपञ्चकेन (यज्ञम्) संयोगवियोगव्यवहारम् (यज्ञायज्ञियेन) म० ६। सर्वयज्ञेभ्यो हितेन वेदज्ञानेन ॥
