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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
ब्रह्मविद्या का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (बृहत्) बृहत् बड़ा [आकाश] (च च) और (रथन्तरम्) रथन्तर [रमणीय पदार्थों से पार लगानेवाला, जगत्] (द्वौ) दो, (च) और (यज्ञायज्ञियम्) सब यज्ञों का हितकारी [वेदज्ञान] (च) और (वामदेव्यम्) वामदेव [मनोहर परमात्मा] से जताया गया [भूतपञ्चक] (द्वौ) दो (स्तनौ) स्तन [थन समान] (आस्ताम्) हुए ॥६॥
भावार्थभाषाः - जैसे गौ के चार थन होते हैं, वैसे ही ईश्वरशक्ति से आकाश, जगत्, वेद और पञ्चभूत प्रकट हुए हैं ॥६॥
टिप्पणी: ६−(बृहत्) प्रवृद्धमाकाशम् (च च) समुच्चये (रथन्तरम्) हनिकुषिनीरमिकाशिभ्यः क्थन्। उ० २।२। रमु क्रीडायाम्−क्थन्+संज्ञायां भृतॄवृजि०। पा० ३।२।४६। तॄ प्लवनतरणयोः−स्रच्, मुम् च। रथै रमणीयपदार्थैस्तरति येन तद् जगत् (द्वौ) (स्तनौ) स्तन शब्दे-घञ्। कुचरूपौ (आस्ताम्) (यज्ञायज्ञियम्) वीप्सायां द्वित्वम्। अन्येषामपि दृश्यते। पा० ३।३।१३७। इति दीर्घः। यज्ञर्त्विग्भ्यां घखञौ। पा० ५।१।७१। यज्ञायज्ञ-घ प्रत्ययः। सर्वेभ्यो यज्ञेभ्यो हितं वेदज्ञानम् (वामदेव्यम्) अ० ४।३४।१। वामदेवेन प्रशस्यपरमात्मना विज्ञापितं भूतपञ्चकम् (च) (द्वौ) ॥
