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ऊर्ज॒ एहि॒ स्वध॑ एहि॒ सूनृ॑त॒ एहीरा॑व॒त्येहीति॑ ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

ऊर्जे । आ । इहि । स्वधे । आ । इहि । सूनृते । आ । इहि । इराऽवति । आ । इहि । इति ॥११.४॥

अथर्ववेद » काण्ड:8» सूक्त:10» पर्यायः:2» मन्त्र:4


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

ब्रह्मविद्या का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - “(ऊर्जे) हे बलवती ! (आ इहि) तू आ, (स्वधे) हे धन रखनेवाली ! (आ इहि) तू आ, (सूनृते) हे प्रिय सत्य वाणीवाली ! (आ इहि) तू आ, (इरावति) हे अन्नवाली ! (आ इहि) तू आ, (इति) बस ॥४॥
भावार्थभाषाः - सब लोक-लोकान्तर और प्राणी विराट् नाम ईश्वरशक्ति का आश्रय लेकर जीवनधारण करते हैं ॥४॥
टिप्पणी: ४−(ऊर्जे) ऊर्ज्-अर्शआद्यच्, टाप्। हे बलवति (एहि) आगच्छ (स्वधे) स्वं धनं दधातीति स्वधा, हे धनधारिके (सूनृते) अ० ३।१२।२। सूनृत-अच्। सत्यप्रियवाग्युक्ते (इरावति) इरा, अन्नम्-निघ० २।७। हे अन्नवति (इति) समाप्तौ ॥