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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
ब्रह्मविद्या का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (ताम्) उस से (देवमनुष्याः) सब दिव्य लोक और मनुष्य (अब्रुवन्) बोले,(इयम्) यह [विराट्] (एव) ही (तत्) वह [कर्म] (वेद) जानती है, (उभये) हम दोनों दल (यत् उपजीवेम) जिसके सहारे जीवें, (इति) बस (इमाम्) इसे (उपह्वयामहै) हम पास से पुकारें ॥२॥
भावार्थभाषाः - सब सूर्य चन्द्र आदि लोक और मनुष्य आदि जीव ईश्वरशक्ति का व्याख्यान करते हैं ॥२॥
टिप्पणी: २−(ताम्) विराजम् (देवमनुष्याः) सूर्यचन्द्रादिदिव्यलोका मनुष्यादिप्राणिनश्च (अब्रुवन्) अकथयन् (इयम्) विराट् (एव) (तत्) कर्म (वेद) जानाति (यत्) कर्म (उभये) उभादुदात्तो नित्यम्। पा० २।५।४४। उभ-तयप्स्थाने अयच्। द्विसमुदायिनो वयम् (उपजीवेम) आश्रित्य प्राणान् धारयेम (इमाम्) (उप) उपेत्य (ह्वयामहै) आह्वयाम (इति) ॥
