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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
ब्रह्मविद्या का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (सा) वह [विराट्] (उत् अक्रामत्) ऊपर चढ़ी, (सा) वह (अन्तरिक्षे) अन्तरिक्ष के बीच (चतुर्धा) चार प्रकार [चारों दिशाओं में] (विक्रान्ता) विक्रम [पराक्रम] करती हुई (अतिष्ठत्) ठहरी ॥१॥
भावार्थभाषाः - उस ईश्वरशक्ति के पुरुषार्थ से आकाश में लोक-लोकान्तर उत्पन्न हुए हैं ॥१॥
टिप्पणी: १−(सा) विराट् (अन्तरिक्षे) आकाशे (चतुर्धा) चतुष्प्रकारेण। चतसृषु दिक्षु (विक्रान्ता) विक्रामयुक्ता, पराक्रमिणी (अतिष्ठत्) स्थितवती ॥
