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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
ब्रह्म विद्या का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (अस्य) उसकी (सभाम्) सभा में (यन्ति) जाते हैं, वह (सभ्यः) सभ्य [सभा में] चतुर (भवति) होता है, (यः एवम् वेद) जो ऐसा जानता है ॥९॥
भावार्थभाषाः - पुरुषार्थी, ईश्वरमहिमा जाननेवाला मनुष्य सभा में प्रतिज्ञा पाता है ॥९॥
टिप्पणी: ९−(सभ्यः) सभाया यः। पा० ४।४।१०५। सभा-य प्रत्ययः। सभायां साधुः। सभासद्। अन्यत्पूर्ववत् ॥
