पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
ब्रह्म विद्या का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (सा) वह [विराट्] (उत् अक्रामत्) ऊपर चढ़ी, (सा) वह (सभायाम्) सभा [विद्वानों के समाज] में (नि अक्रामत्) नीचे उतरी ॥८॥
भावार्थभाषाः - विद्वान् लोग ही ईश्वरमहिमा का विचार करते हैं ॥८॥
टिप्पणी: ८−(सभायाम्) विदुषां समाजे। अन्यत् पूर्ववत् ॥
