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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
ब्रह्म विद्या का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - वह [पुरुष] (यज्ञर्तः) यज्ञ में पूजा गया, (दक्षिणीयः) दक्षिणायोग्य और (वासतेयः) वसतीयोग्य (भवति) होता है, (यः एवम् वेद) जो ऐसा जानता है ॥७॥
भावार्थभाषाः - ईश्वर महिमा ही जानकर पुरुष सब प्रकार उन्नति करता है ॥७॥
टिप्पणी: ७−(यज्ञर्तः) यज्ञ ऋ गतौ-क्त। यज्ञे पूजितः (दक्षिणीयः) कडङ्करदक्षिणाच्छ च। पा० ५।१।६९। दक्षिणा-छ। प्रतिष्ठार्हः (वासतेयः) पथ्यतिथिवसतिस्वपतेर्ढञ्। पा० ४।४।१०४। वसति−ढञ्। निवासयोग्यः। अन्यत् पूर्ववत् ॥
