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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
ब्रह्म विद्या का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (सा) वह [विराट्] (उत् अक्रामत्) ऊपर चढ़ी, (सा) वह [सूर्य वा यज्ञ की] (दक्षिणाग्नौ) बढ़ी हुयी अग्नि में (नि अक्रामत्) नीचे उतरी ॥६॥
भावार्थभाषाः - परमेश्वर की महिमा सूर्यादि तेजों और शिल्प आदि व्यवहारों में प्रकट है ॥६॥
टिप्पणी: ६−(दक्षिणाग्नौ) द्रुदक्षिभ्यामिनन्। उ० २।५०। दक्ष वृद्धौ-इनन्। प्रवृद्धे पावके सूर्यस्य यज्ञस्य वा। अन्यत् पूर्ववत् ॥
