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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
ब्रह्म विद्या का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (सा) वह [विराट्] (उत् अक्रामत्) ऊपर चढ़ी, (सा) (आहवनीये) यज्ञयोग्य व्यवहार में (नि अक्रामत्) नीचे उतरी ॥४॥
भावार्थभाषाः - उस विराट् की महिमा प्रत्येक उत्तम कर्म में प्रकट होती है ॥४॥
टिप्पणी: ४−(आहवनीये) आङ्+हु दानादानादनेषु-अनीयर्, यद्वा आहवन-छ-प्रत्ययः। यजनीये व्यवहारे। अन्यत् पूर्ववत् ॥
