0 बार पढ़ा गया
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
ब्रह्म विद्या का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (सा) वह [विराट्] (उत् अक्रामत्) ऊपर चढ़ी, (सा) वह (गार्हपत्ये) गृहपतियों से संयुक्त कर्म में (नि अक्रामत्) नीचे उतरी ॥२॥
भावार्थभाषाः - उस विराट् ने प्रकट होकर जीवसम्बन्धी प्रत्येक व्यवहार में प्रवेश किया है ॥२॥
टिप्पणी: २−(सा) विराट् (उत्) उपरि (अक्रामत्) पादं स्थापितवती (सा) (गार्हपत्ये) अ० ५।३१।५। गृहपतिभिः संयुक्ते कर्मणि (नि) नीचैः ॥
