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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
ब्रह्म विद्या का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (सा उत् अक्रामत्) वह [विराट्] ऊपर चढ़ी, (सा) वह (आमन्त्रणे) अभिनन्दनस्थान में (नि अक्रामत्) नीचे उतरी ॥१२॥
भावार्थभाषाः - बड़े लोगों की प्रशंसा में ईश्वरशक्ति दिखाई देती है ॥१२॥
टिप्पणी: १२− (आमन्त्रणे) आङ्+मत्रि गुप्तपरिभाषणे-ल्युट्। सम्बोधने। अभिनन्दने। अन्यत् पूर्ववत् ॥
