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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
ब्रह्म विद्या का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - [लोग] (अस्य) उसके (समितिम्) संग्राम में (यन्ति) जाते हैं, वह (सामित्यः) संग्रामयोग्य [शूर] (भवति) होता है, (यः एवम् वेद) जो ऐसा जानता है ॥११॥
भावार्थभाषाः - परमेश्वर का विश्वासी पुरुष संग्राम में विजय पाता है ॥११॥
टिप्पणी: ११−(सामित्यः) परिषदो ण्यः। पा० ४।४।१०१। समिति-ण्य, बाहुलकात्। संग्रामे साधुः। शूरः। अन्यत् पूर्ववत् ॥
