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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
मनुष्य कर्त्तव्य का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (इह) इस [परमेश्वर] में (ते) तेरी (असुः) बुद्धि, (इह) इस में (प्राणः) प्राण, (इह) इसमें (आयुः) जीवन, (इह) इसमें (ते) तेरा (मनः) मन [हो]। (त्वा) तुझको (निर्ऋत्याः) महा विपत्ति [अविद्या] के (पाशेभ्यः) जालों से (दैव्या) दैवी (वाचा) वाणी [वेदविद्या] के साथ (उत्) ऊपर (भरामसि) हम धरते हैं ॥३॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य परमात्मा की आज्ञापालन में सब इन्द्रियों सहित आत्मसमर्पण करें, यही विपत्तियों से बचने के लिये वेद का उपदेश है ॥३॥
टिप्पणी: ३−(इह) अस्मिन् परमेश्वरे (ते) तव (असुः) प्रज्ञा-निघ० ३।९। (इह) (प्राणः) जीवनसाधनं वायुः (इह) (आयुः) जीवनम् (इह) (ते) (मनः) अन्तःकरणम् (उत्) ऊर्ध्वम् (त्वा) (निर्ऋत्याः) अ० २।१०।१। कृच्छापत्तेः। अविद्यायाः (पाशेभ्यः) जालेभ्यः (दैव्या) देव-अण्, ङीप्। देवात् परमेश्वरात् प्राप्तया (वाचा) वाण्या (भरामसि) धरामः ॥
