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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
मनुष्य कर्त्तव्य का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (भगः) सेवनीय सूर्य ने (एनम्) इसे (उत्) ऊपर को, (अंशुमान्) अच्छी किरणोंवाले (सोमः) चन्द्रमा ने (एनम्) इसे (उत्) ऊपर को (अग्रभीत्) ग्रहण किया है। (देवाः) दिव्य (मरुतः) वायुगणों ने (एनम्) इसे (उत्) ऊपर को, (इन्द्राग्नी) बिजुली और [भौतिक] अग्नि ने (स्वस्तये) अच्छी सत्ता के लिये (उत्) ऊपर को [ग्रहण किया है] ॥२॥
भावार्थभाषाः - जो विज्ञानी पुरुष सूर्य आदि संसार के सब पदार्थों से उपकार लेते हैं, वे कल्याण भोगते हैं ॥२॥
टिप्पणी: २−(उत्) ऊर्ध्वम् (एनम्) पुरुषम् (भगः) सेवनीयः सूर्यः (अग्रभीत्) अग्रहीत्। धृतवान् (उत्) (एनम्) (सोमः) चन्द्रः (अंशुमान्) प्रशस्तकिरणयुक्तः (उत्) (एनम्) (मरुतः) अ० १।२०।१। वायुगणाः (देवाः) प्रशस्तगुणाः (उत्) (इन्द्राग्नी) विद्युत्पावकौ (स्वस्तये) अ० १।३०।२। सु+अस सत्तायाम्-ति। सुसत्तायै ॥
