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मन॑सस्पत इ॒मं नो॑ दि॒वि दे॒वेषु॑ य॒ज्ञम्। स्वाहा॑ दि॒वि स्वाहा॑ पृथि॒व्यां स्वाहा॒न्तरि॑क्षे॒ स्वाहा॒ वाते॑ धां॒ स्वाहा॑ ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

मनस: । पते । इमम् । न: । दिवि । देवेषु । यज्ञम् । स्वाहा । दिवि । स्वाहा । पृथिव्याम् । स्वाहा । अन्तरिक्षे । स्वाहा । वाते । धाम् । स्वाहा ॥१०२.८॥

अथर्ववेद » काण्ड:7» सूक्त:97» पर्यायः:0» मन्त्र:8


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

मनुष्य धर्म का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (मनसःपते) हे मन के स्वामी [मनुष्य !] (इमम्) इस (नः) अपने [हमारे] (यज्ञम्) संगतिकरण व्यवहार को (दिवि) आकाश में [वर्तमान] (देवेषु) दिव्य पदार्थों में (स्वाहा) सुन्दर वाणी के साथ, [अर्थात्] (दिवि) सूर्य में (स्वाहा) सुन्दर वाणी के साथ, (पृथिव्याम्) पृथिवी में (स्वाहा) सुन्दर वाणी के साथ, (अन्तरिक्षे) मध्यलोक में (स्वाहा) सुन्दर वाणी के साथ, (वाते) वायु में (स्वाहा) सुन्दर वाणी के साथ, (धाम्) मैं धारण करूँ ॥८॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य वेद द्वारा अपनी मननशक्ति बढ़ाकर सूर्यविद्या, पृथिवीविद्या, अन्तरिक्षविद्या और वायुविद्या में निपुण होकर उपकार करें ॥८॥ इस मन्त्र का पूर्वभाग कुछ भेद से यजुर्वेद में है−८।२१ ॥
टिप्पणी: ८−(मनसः) अन्तःकरणस्य (पते) स्वामिन् (इमम्) (नः) अस्माकम् (दिवि) आकाशे वर्तमानेषु (देवेषु) दिव्यपदार्थेषु (यज्ञम्) संगतिकरणव्यवहारम् (स्वाहा) सुवाण्या वेदवाण्या द्वारा (दिवि) सूर्यलोके (पृथिव्याम्) भूलोके (अन्तरिक्षे) मध्यलोके (वाते) वायुविद्यायाम् (धाम्) दधातेर्विधिलिङि छान्दसं रूपम्। धरेयम्। अन्यद् गतम् ॥