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पूष॒न्तव॑ व्र॒ते व॒यं न रि॑ष्येम क॒दा च॒न। स्तो॒तार॑स्त इ॒ह स्म॑सि ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

पूषन् । तव । व्रते । वयम् । न । रिष्येम । कदा । चन । स्तोतार: । ते । इह । स्मसि ॥१०.३॥

अथर्ववेद » काण्ड:7» सूक्त:9» पर्यायः:0» मन्त्र:3


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

परमेश्वर के उपासना का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (पूषन्) हे पूषा, पालन करनेवाले परमेश्वर ! (तव) तेरे (व्रते) वरणीय नियम में [रहकर] (वयम्) हम (कदा चन) कभी भी (न) न (रिष्येम) दुःखी होवें। (इह) यहाँ पर (ते) तेरे (स्तोतारः) स्तुति करनेवाले (स्मसि) हम लोग हैं ॥३॥
भावार्थभाषाः - पुरुषार्थी लोग परमेश्वर के गुण और कर्मों के अनुकूल चलकर सदा सुखी रहते हैं ॥३॥ यह मन्त्र ऋग्वेद में है-म० ६।५४।९ और यजु० ३४।४१ ॥
टिप्पणी: ३−(पूषन्) पोषक परमात्मन् (तव) (व्रते) वरणीये नियमे (वयम्) उपासकाः (न) निषेधे (रिष्येम) रिष हिंसायाम्, दैवादिकः, अकर्मकः। हिंसिता भवेम (कदा चन) कदापि (स्तोतारः) स्तावकाः (ते) तव (इह) अत्र (स्मसि) स्मः। भवामः ॥