मनुष्य के कर्तव्य का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (यत्) जैसे (उस्रियासु) गौवों में (घृतम्) घृत और (पयः) दूध (आहुतम्) दिया गया है, (अश्विना) हे चतुर स्त्री-पुरुषो ! (आ गतम्) आवो, (अयम् सः) वही (वाम्) तुम दोनों का (भागः) भाग [सेवनीय व्यवहार] है। (माध्वी) हे मधुविद्या [वेदविद्या] के जाननेवाले, (विदथस्य) जानने योग्य कर्म के (धर्तारा) धारण करनेवाले, (सत्पती) सत्पुरुषों के रक्षा करनेवाले ! तुम दोनों (दिवः) सूर्य के (रोचने) प्रकाश में (तप्तम्) ऐश्वर्ययुक्त (घर्मम्) प्रकाशमान [घर्म] का (पिबतम्) पान करो ॥४॥
भावार्थभाषाः - जैसे गौ से घृत दुग्ध आदि सार पदार्थ लिया जाता है, वैसे ही विद्वान् स्त्री-पुरुष संसार के सर्व पदार्थों से तत्त्व ज्ञान प्राप्त करें, और जैसे सूर्य के प्रकाश में सब पदार्थ प्रकाशित होते हैं, वैसे ही ब्रह्म विद्या का प्रकाश करके आनन्दित होवें ॥४॥