0 बार पढ़ा गया
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
पुरुषार्थ करने का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - [हे मनुष्यो !] (उत् तिष्ठत) खड़े हो जाओ, (इन्द्रस्य) बड़े ऐश्वर्यवाले मनुष्य के (ऋत्वियम्) सब काल में मिलनेवाले (भागम्) ऐश्वर्यसमूह को (अव पश्यत) खोजो। (यदि) जो (श्रातम्) वह परिपक्व [निश्चित] है, (जुहोतन) ग्रहण करो, (यदि) जो (अश्रातम्) अपरिपक्व [अनिश्चित] है, [उसे पक्का, निश्चित करके] (ममत्तन) तृप्त [भरपूर] करो ॥१॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य बड़े मनुष्यों के समान निश्चित ऐश्वर्य प्राप्त करें, और अनिश्चित कर्म को विवेकपूर्वक निश्चित करके समाप्त करें ॥१॥ मन्त्र १-३ कुछ भेद से ऋग्वेद में हैं−१०।१७९।१-३ ॥
टिप्पणी: १−(उत्तिष्ठत) ऊर्ध्वं तिष्ठत। पौरुषं कुरुत (अवपश्यत) निरीक्षध्वम् (इन्द्रस्य) परमैश्वर्यवतो मनुष्यस्य, (भागम्) भग-अण् समूहे। ऐश्वर्यसमूहम् (ऋत्वियम्) अ० ३।२०।१। सर्वेषु ऋतुषु कालेषु भवम् (यदि) सम्भावनायाम् (श्रातम्) श्रीञ् पाके-क्त। अपस्पृधेथामानृचुः०। पा० ६।१।३६। इति श्राभावः। पक्वम्। निश्चितम् (जुहोतन) हु दानादानादनेषु। लोटि तस्य तनप्, जुहुत। गृह्णीत (यदि) (अश्रातम्) अपक्वम्। अनिश्चितम् (ममत्तन) मद तृप्तयोगे। लोटि शपः श्लु। मदयत। तर्पयत। समाधत्त ॥
