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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
शत्रु के दमन का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - [हे शत्रु !] (ते) तेरी (बाहू) दोनों भुजाओं को (अपि नह्यामि) बाँधे देता हूँ और (आस्यम्) मुख को (अपि) भी (नह्यामि) बन्द करता हूँ। (घोरस्य) भयंकर (अग्नेः) तेजस्वी सेनापति के (तेन मन्युना) उस क्रोध से (ते) तेरे (हविः) भोजनादि ग्राह्य पदार्थ को (अवधिषम्) मैंने नष्ट कर दिया है ॥५॥
भावार्थभाषाः - मन्त्र चार के समान ॥५॥
टिप्पणी: ५−(घोरस्य) भयङ्करस्य। अन्यत् पूर्ववत्-म० ४ ॥
