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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
शत्रु के दमन का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - [हे शत्रु !] (ते) तेरे (अपाञ्चौ) पीछे को चढ़ाये गये (उभौ) दोनों (बाहू) भुजाओं को (अपि) और (आस्यम्) मुख को (नह्यामि) मैं बाँधता हूँ। (देवस्य) विजयी (अग्नेः) तेजस्वी सेनापति के (तेन मन्युना) उस क्रोध से (ते) तेरे (हविः) भोजन आदि ग्राह्यपदार्थ को (अवधिषम्) मैंने नष्ट कर दिया है ॥४॥
भावार्थभाषाः - राजा दुराचारियों को दण्ड देकर कारागार में रखकर प्रजा की रक्षा करे ॥४॥
टिप्पणी: ४−(अपाञ्चौ) अपाञ्चनौ पृष्ठे सम्बद्धौ (ते) तव (उभौ) द्वौ (बाहू) भुजौ (अपि) एव (नह्यामि) बध्नामि (आस्यम्) मुखम् (अग्नेः) तेजस्विनः सेनापतेः (देवस्य) विजयमानस्य (मन्युना) तेजसा। क्रोधेन (ते) तव (अवधिषम्) हन्तेर्लुङ्। नाशितवानस्मि (हविः) होतव्यम्। ग्राह्यं द्रव्यम् ॥
