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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
सरस्वती की आराधना का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (सरस्वति) हे सरस्वती ! तू (नः) हमारे लिये (शिवा) कल्याणी, (शंतमा) अत्यन्त शान्ति देनेवाली और (सुमृडीका) अत्यन्त सुख देनेवाली (भव) हो। हम लोग (ते) तेरे (संदृशः) यथावत् दर्शन [यथार्थ स्वरूप के ज्ञान] से (मा युयोम) कभी अलग न होवें ॥३॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य नित्य अभ्यास से विद्या का ठीक-ठीक स्वरूप जान कर आत्मा को सदा शान्त रक्खें ॥३॥
टिप्पणी: ३−(शिवा) कल्याणी (नः) अस्मभ्यम् (शंतमा) अत्यर्थं रोगनिवारिका (भव) (सुमृडीका) अत्यन्तं सुखदा (सरस्वति) (ते) तव (मा युयोम) यौतेर्लोटि शपः श्लुः। पृथग्भूता मा भवेम (संदृशः) दृशिर्-क्विप्। समीचीनाद् दर्शनात्। यथार्थस्वरूपज्ञानात् ॥
