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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
सरस्वती की आराधना का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (देवि) हे देवी (सरस्वति) सरस्वती ! [विज्ञानवती वेदविद्या] (ते) अपने (दिव्येषु) दिव्य (व्रतेषु) व्रतों [नियमों] में और (धामसु) धर्मों [धारण शक्तियों] में [हमारे] (आहुतम्) दिये हुए (हव्यम्) ग्राह्य कर्म को (जुषस्व) स्वीकार कर, (देवि) हे देवी ! (नः) हमें (प्रजाम्) [उत्तम] प्रजा (ररास्व) दे ॥१॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य ब्रह्मचर्य आदि नियमों से उत्तम विद्या प्राप्त करके सब प्रजा प्राणीमात्र को उत्तम बनावें ॥१॥
टिप्पणी: १−(सरस्वती) विज्ञानवति (व्रतेषु) नियमेषु (ते) तव। स्वेषु (दिव्येषु) उत्तमेषु (देवि) दिव्यगुणे (धामसु) धारणसामर्थ्येषु। धर्मसु (जुषस्व) सेवस्व (हव्यम्) हु-यत् ग्राह्यं कर्म (आहुतम्) सम्यग् दत्तम् (प्रजाम्) मनुष्यादिरूपाम् (देवि) (ररास्व) रा दाने, शपः श्लुः। देहि (नः) अस्मभ्यम् ॥
