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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
वैद्य के कर्म का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (यत्) जो कुछ (दुष्कृतम्) दुष्कर्म (यद् वा) अथवा (यत्) जो कुछ (शमलम्) मलिन कर्म (पापया) पाप बुद्धि से (चेरिम) हमने किया है। (विश्वतोमुख) हे सब ओर मुख रखनेवाले ! [अतिदूरदर्शी] (अपामार्ग) हे सर्वथा संशोधक ! (त्वया) तेरे साथ (तत्) उसको (अप मृज्महे) हम शोधते हैं ॥२॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य दुष्कर्म और मलिनकर्म से उत्पन्न रोगों को सद्वैद्य की सम्मति से औषध द्वारा निवृत्त करें ॥२॥
टिप्पणी: २−(यत्) यत् किञ्चित् (दुष्कृतम्) दुष्कर्म (यत्) (शमलम्) अ० ४।९।६। मालिन्यम् (यद् वा) अथवा (चेरिम) चर गतिभक्षणयोः-लिट्। वयं कृतवन्तः (पापया) पापबुद्ध्या (त्वया) (तत्) दुष्कृतं शमलं वा (विश्वतोमुख) सर्वदिङ्मुख। अतिदूरदर्शिन् (अपामार्ग) म० १। सर्वथा संशोधक (अप मृज्महे) सर्वथा शोधयामः ॥
