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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
वैद्य के कर्म का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (अपामार्ग) हे सर्वसंशोधक वैद्य ! [वा अपामार्ग औषध !] (त्वम्) तू (हि) निश्चय करके (प्रतीचीनफलः) प्रतिकूलगतिवाले रोगों का नाश करनेवाला (रुरोहिथ) उत्पन्न हुआ है। (इतः मत्) इस मुझसे (सर्वान्) सब (शपथान्) शापों [दोषों] को (अधि) अधिकारपूर्वक (वरीयः) अतिदूर (यवयाः) तू हटा देवे ॥१॥
भावार्थभाषाः - जैसे वैद्य अपामार्ग आदि औषध से रोगों को दूर करता हैं, वैसे ही विद्वान् अपने आत्मिक और शारीरिक दोषों को हटावे ॥१॥ अपामार्ग औषध विशेष है, जिससे कफ़ बवासीर, खुजली, उदररोग और विषरोग का नाश होता है−देखो अ० ४।१७।६ ॥
टिप्पणी: १−(प्रतीचीनफलः) अ० ५।१९।७। प्रतिकूलगतिमतां रोगाणां विदारकः (हि) निश्चयेन (त्वम्) (अपामार्ग) अ० ४।१७।६। हे सर्वथा संशोधक वैद्य। औषधविशेष (रुरोहिथ) रुह बीजजन्मनि प्रादुर्भावे च-लिट् उत्पन्नो बभूविथ (सर्वान्) (मत्) मत्तः (शपथान्) शापान् दोषान् (अधि) अधिकृत्य (वरीयः) उरुतरम्। अति दूरम् (यावयाः) यु मिश्रणामिश्रणयोः-लेटि, आडागमः, सांहितिको दीर्घः। पृथक् कुर्याः (इतः) अस्मात् ॥
