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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
वेदविद्या प्राप्ति का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (अग्ने) हे विद्वन् आचार्य ! हम (तपः) तप [द्वन्द्वसहन] (तप्यामहे) करते हैं, और (तपः) ब्रह्मचर्यादि व्रत (उप तप्यामहे) यथावत् साधते हैं। (श्रुतानि) वेदशास्त्रों को (शृण्वन्तः) सुनते हुए (वयम्) हम (आयुष्मन्तः) उत्तम जीवनवाले और (सुमेधसः) तीव्र बुद्धिवाले [हो जावें] ॥२॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य द्वन्द्वसहन और ब्रह्मचर्यसेवन से वेदों का श्रवण, मनन और निदिध्यासन करके संसार में कीर्त्तिमान् होवें ॥२॥
टिप्पणी: २−(तप्यामहे) साधयामः (श्रुतानि) वेदशास्त्राणि (शृण्वन्तः) श्रवणेन स्वीकुर्वन्तः। अन्यत् पूर्ववत्-म० १ ॥
