पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
कुवचन के त्याग का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (इह एव) यहाँ ही (स्त) रहो, (अनु) पीछे-पीछे (मा गात) मत चलो, (विश्वा) सब (रूपाणि) रूपवाली वस्तुओं को (पुष्यत) पुष्ट करो। (भद्रेण सह) कुशल के साथ (आ एष्यामि) मैं आऊँगा, [फिर] (मया) मेरे साथ (भूयांसः) अधिक-अधिक होकर (भवत) रहो ॥७॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य परदेश जाने पर प्रतिज्ञा करके स्वदेशवृद्धि की चिन्ता रक्खे ॥७॥
टिप्पणी: ७−(इह) अत्र (एव) (स्त) भवत (अनु) मम पश्चात् (मा गात) इण् गतौ-माङि लुङि रूपम्। मा गच्छत (विश्वा) सर्वाणि (रूपाणि) रूपवन्ति निरूप्यमाणानि वा पुत्रादीनि वस्तूनि (पुष्यत) समर्धयत (ऐष्यामि) आगमिष्यामि (भद्रेण) कुशलेन (सह) सहितः (भूयांसः) अतिप्रभूताः (भवत) (मया) पुनरागतेन ॥
