पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
विष नाश का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - [हे बिच्छू वा सर्प !] (त्वा) तुझको (पिपीलिकाः) चिउँटियें (अदन्ति) खा जाती हैं और (मयूर्यः) मोरनियें (वि वृश्चन्ति) काट डालती हैं। [हे मनुष्यो !] (सर्वे) तुम सब (शार्कोटम्) बिच्छू वा सर्प के (विषम्) विष के (अरसम्) निर्बल (भल) भली-भाँति (ब्रवाथ) बतलाओ ॥७॥
भावार्थभाषाः - जैसे चिउँटी, मोर, मोरनी आदि विषैले जीवों का आहार कर जाते हैं, वैसे ही मनुष्य ओषधि द्वारा विष को निर्बल करके हटावे ॥७॥
टिप्पणी: ७−(अदन्ति) भक्षयन्ति (त्वा) त्वां वृश्चिकं सर्पं वा (पिपीलिकाः) अपि+पील रोधने-ण्वुल्, अल्लोपः, टापि, अत इत्वम्। पिपीलिका पेलतेर्गतिकर्मणः-निरु० ७।१३। क्षुद्रजन्तुविशेषाः (वि) विशेषेण (वृश्चन्ति) छिन्दन्ति (मयूर्यः) मीनातेरूरन्। उ० १।६७। मीञ् हिंसायाम्-ऊरन्, ङीप्। मयूरस्त्रियः (सर्वे) यूयं सर्वे विषनिर्हारकाः। (भल) भल परिभाषणहिंसादानेषु-पचाद्यच्। साधु (ब्रवाथ) लेटि आडागमः। ब्रूत (शार्कोटम्) शर्कोट-म० ५, अण्। शर्कोटस्य वृश्चिकस्य सर्पस्य वा सम्बन्धि (अरसम्) निर्बलम् (विषम्) ॥
