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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
विष नाश का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - [हे बिच्छू !] (न) न तो (ते) तेरे (बाह्वोः) दोनों भुजाओं में (बलम्) बल (अस्ति) है, (न) न (शीर्षे) शिर में (उत) और (न) न (मध्यतः) बीच में है। (अथ) फिर (किम्) क्यों (अमुया पापया) उस पाप बुद्धि से (पुच्छे) पूँछ में (अर्भकम्) थोड़ा सा [विष] (बिभर्षि) तू रखता है ॥६॥
भावार्थभाषाः - जैसे बिच्छू सामने से निर्विष होता है और पीछे से चट्ट डंक मारता है, मनुष्यों को ऐसी कुटिलता छोड़ कर सर्वथा सरलस्वभाव होना चाहिये ॥६॥
टिप्पणी: ६−(न) निषेधे (ते) तव (बाह्वोः) हस्तयोः (बलम्) सामर्थ्यम् (अस्ति) (न) (शीर्षे) शिरसि (न) (उत) अपि (मध्यतः) सप्तम्यर्थे तसिः। मध्ये। कटिभागे (अथ) पुनः (किम्) किमर्थम् (पापया) पापिष्ठया बुद्ध्या (अमुया) अनया (पुच्छे) पुछ प्रमादे-अच्। लाङ्गले (बिभर्षि) धरसि (अर्भकम्) अल्पे। पा० ५।३।८५। अल्पार्थे कन्। अत्यल्पं विषम् ॥
