0 बार पढ़ा गया
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
विष नाश का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (अस्य) इस (अरसस्य) निर्बल [तुच्छ वा काटनेवाले], (नीचीनस्य) नीचे पड़े हुए, (उपसर्पतः) रेंगते हुए, (शर्कोटस्य) काटकर टेढ़ा कर देनेवाले [बिच्छू आदि] के (विषम्) विष को (हि) निश्चय करके (आ-अदिषि) मैंने खण्डित कर दिया है (अथो) और (एनम्) इस [जन्तु] को (अजीजभम्) मैंने कुचल डाला है ॥५॥
भावार्थभाषाः - बिच्छू आदि के विष को हटाकर उस विषैले जन्तु को भी मार डालें, जिससे वह औरों को न सतावे ॥५॥
टिप्पणी: ५−(अरसस्य) निर्बलस्य तुच्छस्य। यद्वा। अत्यविचमितमि०। उ० ३।११७। ऋ हिंसायाम्-असच्। हिंसकस्य (शर्कोटस्य) अन्येभ्योऽपि दृश्यन्ते। पा० ३।२।७५। शॄ हिंसायां-विच्+कुट कौटिल्ये-घञ्। शरा हिंसनेन कुटिलीकरस्य (नीचीनस्य) नीच-ख। नीचदेशे भवस्य (उपसर्पतः) समीपं गच्छतः (विषम्) (हि) अवश्यम् (आ-अदिषि) दो खण्डने लुङ्, अत्मनेपदं छान्दसम्। सर्वतः खण्डितवानस्मि (अथो) अपि च (एनम्) जन्तुम् (अजीजभम्) जभि हिंसने। अनीनशम् ॥
