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इ॒यं वी॒रुन्मधु॑जाता मधु॒श्चुन्म॑धु॒ला म॒धूः। सा विह्रु॑तस्य भेष॒ज्यथो॑ मशक॒जम्भ॑नी ॥

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पद पाठ

इयम् । वीरुत् । मधुऽजाता । मधुऽश्चुत् । मधुला । मधू: । सा । विऽह्रुतस्य । भेषजी । अथो इति । मशकऽजम्भनी ॥५८.२॥

अथर्ववेद » काण्ड:7» सूक्त:56» पर्यायः:0» मन्त्र:2


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

विष नाश का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (इयम्) यह [ब्रह्मविद्या] (वीरुत्) जड़ी-बूटी (मधुजाता) मधुरपन से उत्पन्न हुई, (मधुश्चुत्) मधुरपन टपकानेवाली (मधुला) मधुरपन देनेवाली और (मधूः) मधुर स्वभाववाली है, (सा) वही (विह्रुतस्य) बड़े कुटिल विष की (भेषजी) ओषधि (अथो) और (मशकजम्भनी) मच्छरों [मच्छर के समान गुणों] की नाश करनेवाली है ॥२॥
भावार्थभाषाः - जैसे उत्तम ओषधि से बड़े-बड़े विष और क्लेश नाश होते हैं, वैसे ही मनुष्य ब्रह्मविद्या द्वारा अपने दोषों का नाश करे ॥२॥
टिप्पणी: २−(इयम्) ब्रह्मविद्या (वीरुत्) ओषधिः (मधुजाता) माधुर्याद् निष्पन्ना (मधुश्चुत्) श्चुतिर् क्षरणे-क्विप्। मधुररसस्य क्षरणशीला (मधुला) ला दाने-क। माधुर्यदात्री (मधूः) मधुरस्वभावा (सा) वीरुत् (विह्रुतस्य) विशेषकुटिलस्य विषस्य (भेषजी) ओषधिः (अथो) अपि च (मशकजम्भनी) जभि नाशने-ल्युट्। मशकानां मशकस्वभावानां नाशयित्री ॥