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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
वेदमार्ग के ग्रहण का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (वसो) हे श्रेष्ठ परमात्मन् ! (ये) जो (ते) तेरे (दिवः) प्रकाश के (पन्थानः) मार्ग (अव) निश्चय करके हैं, (येभिः) जिनके द्वारा (विश्वम्) संसार को (ऐरयः) तूने चलाया है। (तेभिः) उनके ही (सुम्नया) सुख के साथ (नः) हमें (आ धेहि) सब ओर से पुष्ट कर ॥१॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य परमेश्वर के वेदमार्ग पर चलकर शारीरिक, आत्मिक और सामाजिक पुष्टि करें ॥१॥
टिप्पणी: १−(ये) (ते) तव (पन्थानः) वेदमार्गाः (अव) निश्चयेन (दिवः) प्रकाशस्य (येभिः) यैः (विश्वम्) जगत् (ऐरयः) ईर गतौ-लङ्। प्रेरितवानसि (तेभिः) तैः पथिभिः (सुम्नया) आतश्चोपसर्गे। पा० ३।१।१३६। इति सु+म्ना अभ्यासे-क। विभक्तेर्याजादेशः। सुम्नं सुखम्-निघ० ३।६। सुम्नेन सुखेन (आ) सम्यक् (धेहि) पोषय (नः) अस्मान् (वसो) हे श्रेष्ठपरमात्मन् ॥
