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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
वेद विद्या के ग्रहण का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (ऋचम्) स्तुति विद्या [ईश्वर से लेकर समस्त पदार्थों के ज्ञान] (साम) दुःखनाशक मोक्ष विद्या का (यजामहे) हम सत्कार करते हैं, (याभ्याम्) जिन दोनों के द्वारा (कर्माणि) कर्मों को (कुर्वते) वे [सब प्राणी] करते हैं। (एते) यह दोनों (सदसि) [संसार रूपी] बैठक में (राजतः) विराजते हैं और (देवेषु) विद्वानों के बीच (यज्ञम्) सङ्गति (यच्छतः) दान करते हैं ॥१॥
भावार्थभाषाः - सब मनुष्य वेद द्वारा विद्या प्राप्त करके संसार में प्रतिष्ठित होवें ॥१॥
टिप्पणी: १−(ऋचम्) ऋच स्तुतौ-क्विप्। ऋग् वाङ्नाम-निघ० १।११। ऋगर्चनी-निरु० १।८। स्तुतिविद्याः। ईश्वरमारभ्य समस्तपदार्थज्ञानम् (साम) सातिभ्यां मनिन्मनिणौ। उ० ४।१५३। षो अन्तकर्मणि-मनिन्। साम सम्मितमृचास्यतेर्वर्चा सममेन इति नैदानाः-निरु० ७।१२। दुःखनाशिकां मोक्षविद्याम् (याभ्याम्) ऋक्सामाभ्याम् (कर्माणि) कर्तव्यानि (कुर्वते) कुर्वन्ति प्राणिनः (एते) ऋक्सामे (सदसि) संसाररूपे समाजे (राजतः) दीप्येतेः (यज्ञम्) सङ्गतिकरणम् (देवेषु) विद्वत्सु (यच्छतः) दत्तः ॥
