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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
विद्वानों के कर्त्तव्य का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (प्राणापानौ) हे प्राण और अपान ! तुम दोनों (प्र विशतम्) प्रवेश करते रहो, (इव) जैसे (अनड्वाहौ) रथ ले चलनेवाले दो बैल (व्रजम्) गोशाला में (अयम्) यह जीव (जरिम्णः) स्तुति का (शेवधिः) निधि, (अरिष्टः) दुःखरहित होकर (इह) यहाँ पर (वर्धताम्) बढ़ती करे ॥५॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य शारीरिक और आत्मिक बल बढ़ाकर संसार में उन्नति करें ॥५॥
टिप्पणी: ५−(प्र विशतम्) प्रवेशं कुरुतम् (प्राणापानौ) श्वासप्रश्वासौ (अनड्वाहौ) अ० ४।११।१। अनस्+वह प्रापणे-क्विप्, अनसो डश्च। शकट−वहनशक्तौ बलीवर्दौ (इव) यथा (व्रजम्) गोष्ठम् (अयम्) जीवः (जरिम्णः) अ० २।२८।१। जरा स्तुतिर्जरतेः, स्तुतिकर्मणः-निरु० १०।८। जरतेः-इमनिन्। स्तुत्यस्य कर्मणः (शेवधिः) अ० ५।२२।१४। निधिः-निरु० २।४। (अरिष्टः) अहिंसितः (इह) अस्मिँल्लोके (वर्धताम्) समृद्धो भवतु ॥
